मध्यप्रदेश में आयुर्वेद औषधि निर्माणी उद्योगों की वित्त-व्यवस्था सतना जिले के विषेष संदर्भ में

 

पुष्पराज कुमारी पाण्डेय

अतिथि विद्वान (वाणिज्य शास. कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सतना मप्र

*Corresponding Author E-mail:  

 

ABSTRACT:

भारत की विकासषील अर्थव्यवस्था में आयुर्वेद औषधि निर्माणी उद्योग का अद्वितीय स्थान है। भारत में उद्योग आज से हजारो वर्ष पूर्व अत्याधिक विकसित अवस्था में था तथा इनके व्दारा निर्मित माल (जड़ी-बुटिया) विष्व के सभी देषो में बड़े आदर के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्राप्त हुआ करती थी परन्तु अंग्रेजी षासन में विदेषी सरकार की स्वार्थ पूर्ण नीति के कारण इनका बहुत अधिक पतन हुआ भारतीय कारीगरों एवं दस्तकारों ने सभी प्रकार के कठिनाइयों के बावजूद भी अनेक प्रकार के ज्ञानों की प्रचीन उद्योगो को जीवित रखा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारी सरकार का यह प्रयत्न रहा है कि देष के औषधी उद्योगों का बड़े उद्योगो के साथ समन्वित विकास हो। आयुर्वेदिक औषधि निर्माणी उद्योग के वित्तीय प्रबंध में सबसे बड़ी समस्या वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये नवीन वित्त की प्राप्ती है। उद्योग के वित्त प्रबंध के पास नवीन वित्त प्राप्त करने के लिए अनेक साधन होते हैं जैसे समता अंषपूंजी, पूर्वाधिकारी अंषपूंजी, ऋणपूंजी (ऋण पत्र), मध्यकालीन ऋण तथा अल्पकालीन ऋण उद्योगों द्वारा इन साधनों में सामंजस्य स्थापित करते हुए सर्वोत्तम साधन का प्रयोग कर नवीन वित्त की प्राप्ति की जाती है। और वित्तीय आवष्यकताओं को पूरा किया जाता है। आयुर्वेद उद्योगों द्वारा पूर्वाधिकार अंषों के निर्गमन में किसी भी प्रकार की रुचि नही दिखाई गई है। साथ ही पिछले दस वर्षो में नये समता अंशों के निर्गमन पर भी ज्यादा ध्यान नही दिया गया।

 

KEYWORDS: आयुर्वेदिक औषधि, वित्तीय प्रबंध, ग्रामीण विकास.

 


 

izLrkouk 

वित्त के बिना सभी कार्य अधूरे हैं। आयुर्वेदिक औषधि निर्माणी उद्योग का उत्पादन क्षेत्र भी इससे अछूते नही है। किसी भी व्यक्ति (मानव) जानवर आदि के अनेक प्रकार के इलाज के लिये इन्ही दवाइयों की आवष्यकता होती है जिसका उत्पादन मध्यप्रदेष के नर्मदा नदी के तट पर एवं भारत के अनेक क्षेत्रों पर किया जाता है मध्यप्रदेष उस दृष्टिकोण से भारत की अग्रणी है क्योंकि यहंा पर नर्मदा घाटी पर 270 प्रकार की जड़ी बूटियों का उत्पादन किया जाता है। भारत सरकार/मध्यप्रदेष सरकार ने इस क्षेत्र के औद्योगिक विकास को ध्यान में रखते हुए वित्तीय समस्याओं का समाधान करने के लिये अनेक तरह की व्यवस्थायें की हैं।

 

वास्तव में औषधी उद्योग अनेक आधारभूत अधोसंरचनात्मक उपक्रम है। अतः इसे अनेक वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जैसे- कार्यषील पूंजी, तरलता तथा रोकड़ प्रबंधन, दीर्घ तथा मध्यकालीन वित्त की पूर्ति संगठित पूंजी बाजार का आभाव, आवागमन एवं संचार सुविधाओं की कमी, पानी के प्रवाह की तरह लगातार बढ़ती हुई कच्चे माल की कीमतें, पूंजी की लागत में बृद्वि एवम औधोगिक सम्बधो के मधुरता भी। ये सारी समस्याये इस क्षेत्र सतना के पिछड़ेपन का प्रमुख कारण कही जा सकती है।

 

प्रस्तुत अध्ययन में उपर्युक्त कठिनाइयों के निराकरण के संदर्भ में कहा जा सकता है कि राज्य षासन/भारत षासन ने सन् 1991 में (भारत के मान्नीय प्रधानमंत्री तथा तत्कालीन वित्त मंत्री के द्वारा) प्रस्तावित उदारीकरण, वैष्वीकरण, बाजारीकरण एक पायदान से दूसरे पायदान तक पहुँचा दिया है। सरकार ने वित्त प्रबंध हेतु औद्योगिक परिवेष को विस्तृत करने के लिये नियमानुसार वैधानिकता के दायरे में रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया की नीतियों के तहत अपने दरवाजे खोल रहे हैं। जो वित्तीय प्रबंधक की कमी को पूरा करने के लिये पर्याप्त हैं।

 

भारत में 7000 पौधें आयुर्वेद चिकित्सा, 700 पौधे युनानी चिकित्सा, 600 सिद्धा, 450 होम्योपैथिक एवं 30 पौधे प्रजातियों का आधुनिक चिकित्सा पद्धति में उपयोग होता है। सतना जिले में अनेक औषधीय पौधे पाये जाते हैं। जिनका उत्पादन इन पौधों के कृषि कार्य के द्वारा होता है। औषधीय की अनेक समस्यायें विद्यमान हैं जिनका निराकरण किया जाना आवष्यक है अन्यथा औषधीय पौधों का लोप हो जायेगा। औषधीय जड़ी-बूटियाँ प्रायः बड़े पेड़ों के संरक्षण में पनपती हैं। आजकल जंगलों में पेड़ों की अधाधुंध कटाई से औषधीय जडी-बूटियों का विनाष हो रहा है और ये प्रायः विलुप्त होते भी जा रहे हैं। अब पहाड़ी इकलाकों में पाये जाने वाली कई जीवन रक्षक औषधियाँ बिरले ही नजर आती है। जहां कभी प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होती थी। सौन्दर्यता की घनी पहाड़ियों पर लम्बे समय से जारी अवैध कटाई पर प्रषासन रोक नही लगा पा रही है। जिसक कारण एक ओर प्राकृतिक सौन्दर्य नष्ट हो रहा है वहीं दूसरी ओर औषधीय पौधों पर संकट के बादल छाये हुये हैं। वन विभाग अवैध कटाई करने वालों के खिलाफ कार्यवाही करने से कतरा रहा है। उसे इन औषधीय पौधों से अस्तित्व के लिए कोई परवाह नही है। हमारे सतना के करीब ही त्यौंथर क्षेत्र के जंगलों में एक जमाने में विविध औषधीय पौधों की भरमार हुआ करती थी। उत्तर प्रदेष के बनारस के आयुर्वेद चिकित्सक एवं वैद्य इन औषधी पौधों को बड़ी मात्रा में ले जाते थे तथा उनसे बहुमूल्य औषधियों का निर्माण करते थे। जिसका लाभ भारत के विभिन्न क्षेत्रों के लोगो को प्राप्त होता था। इसी प्रकार अन्य पहाड़ियों की जड़ी-बूटियां एवं पेड़-पौधे नष्ट होते जा रहे हैं जिस कारण प्राकृतिक सौन्दर्य भी नष्ट हो रहा है। घरेहा, ढ़खरा, सोनवर्षा, षंकरगढ़, सोहागी पहाड़ से सहित अन्य पहाड़ियों में पायी जाने वाली प्रचुर औषधियाँ अब ढूढ़ने पर भी नही मिलती हे। षासन के निर्देषों के बावजूद बन विभाग के कर्मचारी वनों की कटाई रोक पा रहे है और औषधीय पौधों का संरक्षण कर पा रहें हैं। बड़े पेड़ों के विनाष के साथ उनकी घाट में पनापने वाले औषधीय पौधें भी नष्ट हो रहे हैं। एक आयुर्वेदिक चिकित्सक के अनुसार पूरे क्षेत्र में अनेक दुर्लभ औषधियां पाई जाती थी। जिनमें पतावाड़, चिरायता, नागरमोथा, चितपापड़, कालमेघ, सर्पगन्धा, अष्टगन्धा, अंकुकरा, बलपत, हर सिंगार, अर्जुन छाल आदि औषधियों को पनपने का पर्याप्त अवसर प्राप्त होता था लेकिन समय के साथ में औषधियों विलुप्त होने जा रही है। कुछ औषधिया तो विल्कुल ही समाप्त हो गई है। अपवाद रूप में कुछ बची-कुची औषधियों को छोड़ दिया जावे तो षेष औषधीय पौधें क्षेत्र से गायब हो चुके हैं। वास्तव में प्रषासन अभी तक इनकी महत्ता को नही समझा। अतः संरक्षण के लिए आवष्यक कदम नही उठाया। प्रषासन को चाहिये कि जंगलों की अंधाधुंध कआई रोके एवं जीवन रक्षक औषधीय पौधों के बचाव एवं संरक्षण पर ध्यान देष्पर्यावर्णीय संतुलन के लिए जंगलों एवं छोटे पेड़ों का होना आवष्यक है। इनका संरक्षण करके ही प्रकृति के प्रति न्याय कर सकते हैं।

 

सतना संभाग में वित्त प्रबंध की एक प्रमुख समस्या यह है के लोगोे की निम्न उत्पादकता और निम्न आय दर भी है जिसके चलते व्यक्तियों द्वारा जो भी उत्पादन किया जाता है और जो आय अर्जित की जाती है उसका सारा उपभोग वे स्वयं ही कर लेते हैं। जिससे यहां के उद्योगों में इसका निवेष में अंषदान कम हो जाता है। परिणामस्वरूप यहाँ के उद्यमियों को वित्तीय आवश्यकता की पूर्ति के लिये दूसरी ओर मुह ताकना पड़ता है।

 

उद्देश्य:-

षोध सतना संभाग की आयुर्वेद औषधि निर्माणी उद्योगों में वित्तीय प्रबंध के अध्ययन पर आधारित है। सतना संभाग में कई उद्योगांे को अपने कार्यो को पूरा करते हुए नये क्षेत्र तथा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास कर रही है। सभी आयुर्वेद औषधि निर्माण उद्योग अपने लक्ष्यरूपी क्षेत्र की ओर अग्रसर होकर मध्यप्रदेष की प्रेरणा और विकास के नये आयाम स्थापित कर क्षेत्र में अपना एक नया स्थान बना चुकी है। मध्यप्रदेष की आयुर्वेद औषधि निर्माणी उद्योगों का रखरखाव वित्तीय अवलोकन प्रबंधन की रचना प्रस्तुत किये गये हैं। षोध की रचना करते समय निम्नलिखित बातों को (उद्देश्यों) अध्ययन में रखा गया है।

1. आयुर्वेदिक औषधि निर्माणी उद्योग का स्थानीय परिचय का अध्ययन करना।

2. आयुर्वेदिक औषधि निर्माणी उद्योगों द्वारा वित्तीय विषेषताओं का अध्ययन करना।

3. मध्यप्रदेष में आयुर्वेद औषधि निर्माणी उद्योगों के योगदान का पता लगाना।

4. आयुर्वेदिक औषधि का कार्यक्षेत्र का अध्ययन करना।

5. आयुर्वेदिक औषधि निर्माणी उद्योगों के प्रमुख स्रोतों एव व्यय संरचना का अध्ययन करना।

6. आयुर्वेदिक औषधि निर्माणी उद्योग आय-व्यय का स्थाई परिचय का अध्ययन करना।

7. सतना में स्थापित आयुर्वेदिक औषधिनिर्माणी उद्योगों की फार्मेसी का अध्ययन करना।

 

अध्ययन प्रविधि:-

ज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य अपरिहार्य है। षोध कार्यो द्वारा उन प्रष्नों का उत्तर एवं उन समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास किया जाता है जिनका समाधान एवं उत्तर उपलब्ध नही है। अनुसंधान में नवीन की खोज की जाती है एवं नवीन तथ्यों का प्रतिपादन किया जाता है अनुसंधान जो सामग्री प्रदान करता है, वह संगतपूर्ण एवं पक्षपातहीन होती है। मनुष्य स्वभाव में जिज्ञासु होता है। इस कारण प्रारंभ से ही बादल, बिजली, चांद, सूरज, पहाड़, समुद्र, अग्नि, वायु, भूकम्प, जीवन-मरण आदि विस्मयकारक तथा रहस्य के विषय रहे है। जिससे वह इनके स्वरूपों को जानकर तथा समझकर अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए प्रयासरत रहा है। जिज्ञासा को तृप्त करने के क्रम में उसके आरम्भिक ज्ञान में धीरे-धीरे वृद्धि हुई, लेकिन बाद में उनके स्वरूपों के संगठित होने के कारण वह प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या के लिए प्रयासरत होने लगा। अध्ययन या अन्वेषण किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए किया जाता है। ज्ञान की किसी भी शाखा में ध्यानपूर्वक नये तथ्यों की खोज के लिए किये गये अन्वेषण या परिक्षण को अध्ययन कहते है। ज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य अपरिहार्य है। ज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य अपरिहार्य है। षोध कार्यो द्वारा उन प्रष्नों का उत्तर एवं उन समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास किया जाता है जिनका समाधान एवं उत्तर उपलब्ध नही है। अनुसंधान में नवीन की खोज की जाती है एवं नवीन तथ्यों का प्रतिपादन किया जाता है अनुसंधान जो सामग्री प्रदान करता है, वह संगतपूर्ण एवं पक्षपातहीन होती है। मनुष्य स्वभाव में जिज्ञासु होता है। इस कारण प्रारंभ से ही बादल, बिजली, चांद, सूरज, पहाड़, समुद्र, अग्नि, वायु, भूकम्प , जीवन-मरण आदि विस्मयकारक तथा रहस्य के विषय रहे है। जिससे वह इनके स्वरूपों को जानकर तथा समझकर अपनी जिज्ञासा को षांत करने के लिए प्रयासरत रहा है। जिज्ञासा को तृप्त करने के क्रम में उसके आरम्भिक ज्ञान में धीरे-धीरे वृद्धि हुई, लेकिन बाद में उनके स्वरूपों के संगठित होने के कारण वह प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या के लिए प्रयासरत होने लगा। आयुर्वेदिक औषधि निर्माण उद्योगों के वित्तीय साधनों का वृहद अध्ययन करके उसमें उनके प्रबंधक, नियोजन, नियंत्रण तथा समन्वय के लिये ऐसी नीतियों के निर्माण के सुझाव प्रस्तुत करता है? जिससे व्यवसाय, उपलब्ध साधनों का कुषलतम उपयोग कर विकास की पूर्ण अवस्था को प्राप्त कर सके। इसके लिये आयुर्वेद औषधि निर्माण उद्योगों की वित्तीय आवष्यकता, वित्त के साधनों उनके प्राप्ति तथा उपयोगों की व्यवस्था का पूर्णरूपेण अध्ययन तथा विष्लेषण करने का प्रयास किया गया है। सम्बन्धित आंकड़ो को प्राप्त करने के लिये प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आकड़ों को एकत्र किया गया है। प्राथमिक आकड़े कार्य स्थल पर जाकर उत्तरदाताओं से साक्षात्कार अनुसूची पद्धति के माध्यम से एकत्र किये गये हैं। जबकि द्वितीयक आंकड़े प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य एवं सामाजिक प्रभाव से संबंधित विभिन्न प्रकाशित- अप्रकाशित पुस्तकों, शोध पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, शासकीय प्रतिवेदनों आदि से एकत्र कर प्रयोग किये गये हैं।

 

षोध का क्षेत्रः-

किसी भी षोध अध्ययन की व्यवस्थित संपादन के लिए षोध क्षेत्र का निर्धारण एक महत्वपूर्ण तत्व है, किसी भी षोध का क्षेत्र उसकी प्रकृति और उपयुक्ततता पर निर्भर करता है। प्रस्तुत षोध अध्ययन के क्षेत्र प्रारंभ में बहुत संकोचित और एक जिले तक ही सीमित था क्योंकि षोध अध्ययन सतना जिले कि आयुर्वेदिक औषधि निर्माणी उद्योगो से सम्बंधित है लेकिन इसका क्षेत्र सिर्फ जिले तक सीमित नही है, बल्कि सामान्य प्राकृति राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक है; क्योंकि इसके निष्कर्ष सामान्यतः व्यापक स्तर पर लागू होने वाले हैं। षोध कार्य से सम्बंधित समंको तथा तथ्यों का ंसकलन षोध क्षेत्र निर्धारित किए बिना संभव नही है। षोध क्षेत्र ही समंको के संकलन तथा षोध की सफलता को आधार प्रदान करती है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि प्रस्तुत षोध अध्ययन का क्षेत्र सीमित स्तर का होते हुए भी बहुत व्यापक है।

 

सारणी क्र. 1 आयुर्वेदिक औषधि निर्माण का भण्डार

(a)

D;k HkaMkj d{k esagok o izdk’k gsrq mi;qDr jks’kunku gS

gk¡

gk¡

(b)

D;k dPph vkS’kf/k;ksa ds Hk.Mkj.k dh mi;qDr rFkk leqfpr O;oLFkk gS\

gk¡

gk¡

(c)

iSfdax@yscfyax eVsfj;y ds LVksjst gsrq D;k O;oLFkk gS\

vkyekjh] de

lgh gS

(d)

D;k fufeZr vkS"kf/k;ksa ds Hk.Mkj.k dh mi;qDr rFkk leqfpr O;oLFkk gS\

gk¡

gk¡

(e)

D;k HkaMkj esa lkexzh dks ueh o thoksa ds laØe.k ls cpkus dh i;kZIr O;oLFkk gS\

gk¡

gk¡

(f)

ftu dPph vkS"kf/k@lkexzh@vkS"kf/k ik= vkfn ds HkaMkj.k gsrq fu;af=r okrkoj.k dh ifjfLFkfr;ka vko’;d gS] muds Hk.Mkj.k gsrq D;k O;oLFkk gS\

vko';drkuqlkj mfpr O;oLFkk gSA

lgh gSA

(g)

D;k dPph vkS"kf/k;ksa ds daVsujksa ij vkS"kf/k;ksa ds uke@izkfIr ds L=ksr@iznkdrkZ @izkfIr fnukad rFkk csap uEcj ds mYys[k lfgr yscy yxkus dk izko/kku fd;k x;k gS] rkfd mudh igpku vklkuh ls gks lds\

gk¡

gk¡

(h)

D;k dPph vkS"kf/k;ksa@lkexzh ijh{k.k v/khu gS] tkap mijkar Lohd`r gS ;k vLohd`r ¼fQYVj VsLV ,iwzOM vkSj fjtsDVsM½ mldh igpku gsrq muds daVsujksa ij yscy yxk;s tkus dh O;oLFkk gS\

gk¡

gk¡

(i)

D;k dPph vkS"kf/k;ksa@lkexzh ds mi;ksx gsrq izFke vkod izFke tkod dh fof/k dk ikyu fd;k tkuk lqfu’pr fd;k x;k gS\

gk¡

gk¡

(j)

D;k dPph vkS"kf/k @lkexzh ds vkod ds le; tkap mijkar Lohd`r gS ;k vLohd`r bldk fjdkMZ rFkk fuekZ.k ds esa mi;ksx dk fjdkMZ j[ks tkus dh O;oLFkk gS\

gk¡

gk¡

(k)

fufeZr vk"kf/k;ksa DokfyVh dUVªksy foHkkx }kjk Lohd`r gksus ds ckn gh fMLiSaV dh tkos] D;k ;g lqfuf’pr djus dh O;oLFkk dh xbZ gS\

gk¡

gk¡

 

lkj.kh Ø- 2 fuekZ.k izfØ;k {ks= esa fuekZ.k dk;Z gsrq LFkku

(a)

D;k vkS"kf/k fuekZ.k rFkk xq.koRrk fu;a=.k gsrq lkexzh rFkk e’khu midj.k dk LFkku fu/kkZj.k] Øec) izfØ;kvksa ds lEiknu esa lqfo/kk rFkk lqj{kk dh n`f’V ls fd;k x;k gS\

gk¡

gk¡

(b)

lkefxz;k¡ e’khu midj.kksa ds fy, fu/kkZfjr LFkku rFkk vkS"kf/k ?kVdksa ;k vkS"kf/k dh vkil esa vnyk cnyh ls feykoV dh lEHkkouk dks jksdus ds fy;s i;kZIr gS\ ¼vkS"kf/k;ksa dh la[;k o Lo:i dks /;ku esa j[kdj izfrosnu izLrqr djsa½

gk¡

gk¡

 


 

lkj.kh Ø- 3 vkS|ksfxd #X.krk dh fLFkfr ¼bdkbZ;ksa dh la[;k½

o’kZ

cM+s o e/;e m|ksx

y?kq m|ksx

dqy

2000

2269

218828

221097

2010

3164

304235

307399

2012

3992

114132

118124

2015

4454

85187

89641

 

सारणी 03 से स्पष्ट होता है कि वर्तमान में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आवागमन के समय के साथ औद्योगिक रूग्णता की समस्या में भी वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 के अंत में जहाँ 2,21097 औद्योगिक इकाइयाॅ रूग्ण भी, वहीं यह आंकडे बढ़कर वर्ष 2010 में 3,07,399 हो गयी।

 

वर्ष 2012 में तीव्र विनिंतेषीकरण तथा औद्योगिक सुधार कार्यक्रमों के कारण रूग्ण इकाइयों की संख्या घटकर 1,18124 हो गई जिन पर बैकों का बकाया (अदत्त) राषी 30,333 करोड़ रुपये था। यद्यपि मार्च 2015 में स्थिति में कुछ सुधार आया और कुल अस्वस्थ (रूग्ण) इकाइयों में 95 इकाइयाँ लघु क्षेत्र में थी परन्तु बैंक ऋणों की बकाया राशि में उनका हिस्सा मात्र 8.7 था।

 

रुग्णता के कारणः

आयुर्वेद औषधि निर्माणी उद्योगो के क्षेत्र में औद्योगिक रूग्णता के लिए प्रायः आन्तरिक एवं बाह्य दोनो तरह के कारण उत्तर दायी है। अतः आयुर्वेद आषधि निर्माण उद्योग रूग्णता को मोटे तौर पर तीन भागो मे बाटा गया है जो इस प्रकार से चार्ट में दिखाया गया है।

 

निष्कर्ष:-

वास्तव में देष और आयुर्वेदिक औषधियों से सम्बंधित उद्योगों की वित्तीय स्थिति ठीक नही है इसके सामान्य कारण एक जैसे हि है, उनमें प्रमुख है-जन सामान्य का इन औषधियों के प्रति जानकारी एवं रूचि का आभाव। वर्तमान समय में अंग्रेजी दवाइयों को ही प्राथमिकता मिल रही है जिसक चलते अंग्रेजी दवाइयों के उद्योगों का विस्तार तेजी से हो रहा है। किन्तु ऐसा नही है। आयुर्वेद की दवाइयाँ भी अंग्रेजी दवाइयांे के पीछे लगी हुई है। और इनकी भी माग-दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। भारतीय आयुर्वेदिक दवाइयों के देष भर में मुख्यतः तीन बड़े कारखाने हैं ये हैं वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन, डाबर आयुर्वेद और सरमायु आयुर्वेद मंदिर। छोटे-मोटे अन्य कारखाने भी इस क्षेत्र में स्थापित किये गये हैं, लेकिन वे इतने लोकप्रिय नही हो सके। हमारे मध्यप्रदेष में आयुर्वेद औषधि निर्माणी उद्योग का सबसे बड़ा उद्योग ग्वालियर में है और वही से मध्यप्रदेष के सभी क्षेत्र में वितरित की जाती हैं।

 

भारतीय आयुर्वेद औषधियों से सम्बंधित उद्योगों की वित्तीय स्थिति का अध्ययन करने के लिए इनके प्रति सरकार उद्योग, समाज, चिकित्सक सभी के दृष्टिकोण को जानना भी आवष्यक है। वास्तव में कहा जाये तो सरकार इसके लिये किसी भी प्रकार की सहायता नही करती है, इसलिये जानकारी के मुताबिक आयुर्वेदिक दवाइयाँ ज्यादातर लोग अपनी निजी सम्पत्ती पर खोले हुये है। जो कि प्रारंम्भिक तौर से देखने से स्पष्ट होता है कि कही भी यह सकारात्मक नही है। देष भर के सभी आयुर्वेदिक उद्योगों की स्थित एक जैसी ही है। इस सम्बंध में यह आवष्यक है कि देषी चिकित्सा पद्धति पर आधारित इन उद्योगों पर एवं विद्या पर सभी स्तर पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।

 

सुझाव:-

औषधियों का उत्पादन कृषि कार्य के द्वारा किया जाता है। वो कृषकों को उत्पादन के लिये जिस प्रकार की सामग्री चाहिये उन्हे समय समय पर दिया जाये जिससे की औषधियों के लोप को रोका जा सके। आजकल जंगलों की जो अंधाधुंध कटाई हो रही है उनको रोका जाये और साथ ही साथ अधिक से अधिक जड़ी-बूटियाँ लगाई जाये। जहाँ पर भारी मात्रा पर जंगलों में जड़ी-बूटियाँ पायी जाती है वहाॅ पर षासन के निर्देष अनुसार रोक लगाना अनिवार्य है जिससे की औषधियों का लोप हो सके और आवष्यकता के अनुसार प्राप्त हो सके। इसके लिये वन विभाग वालों को षासन के प्रति कड़ी कार्यवाही करना अति आवष्यक है जिससे कि वनो ंकी कटाई रुक सके और औषधी पौधों का संरक्षण किया जा सके। वन विभाग को बड़े पेड़ लगवाना उचित है जिससे की मधुमक्खी अपना छत्ता रखकर उसमे रस भर सके और लोगो को सही षहद मिल सकें अतः षासन को इसके लिये कदम उठाना पडेगा तभी ये औषधियां (बनी हुई) टिकी रह सकती हैं बरना ये भी एक दिन खत्म हो जायेगी।

 

संदर्भ ग्रंथ सूचीः-

1.       जैन, डाॅ. एम. के., अध्ययन विधियाँ, यूनिवर्सिटी पब्लिकेशन नई दिल्ली, 2006

2.       बी. सी. सिन्हा, भारतीय अर्थव्यवस्था, साहित्य भवन पब्लिसर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूट्स, 2012-08

3.       प्रो. विजेन्द्रपाल सिंह, कृषि अर्थशास्त्र, नवयुग साहित्य सदन, 2010

4.       वित्तीय कार्य एवं महत्व, डा. चतुर्भुज मेमोरिया, साहित्य भवन आगरा, 2009

5.       चरक संहिता, आयुर्वेद दीपिका टीका, चक्रपाणिकृत, चैखम्भा संस्कृत संस्थान वाराणसी, 2001

6.       वित्तीय संस्थाओं की वित्त सहायता, जैन खण्डेलवाल पारिक, रमेश बुक डिपो, जयपुर, 2012

7.       शुक्ला डाॅ. अखिलेश, रीवा दर्शन, गायत्री पब्लिकेशन सतना, 2012

8.       डा. विद्याधर शुक्ल एवं डा. रविदत्त त्रिपाठी, आयुर्वेद का परिचय, संभागीय कार्यालय, सतना, रेल्वे स्टेशन के पास सतना, 2014

9.       मिश्रा एवं पुरी, भारतीय अर्थव्यवस्था, रामप्रसाद एण्ड संस, 2002-03

10.    डाॅ. चतुर्भुज मामोरिया, भारत की आर्थिक समस्याएँ, साहित्य भवन पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूट्स, 2012-08

11.    डाॅ. चन्द्रप्रकाष दुबे, आरोग्य विज्ञान तथा जनस्वास्थ्य, नाथपुस्तक भंडार रेलवे, रोड रोहतक, 2003

12.    औद्योगिक रुग्णता, डा. ठक्कुर आर.डी (प्राचार्य) शास..आयुर्वेद महाविद्यालय, निपनिया, सतना 2011

13.    लघु उद्योग, जिला व्यापार उद्योग केन्द्र,, सतना, 2013

14.    डाॅ. लक्ष्मीधर द्विवेदी, आयुर्वेद के मूल सिंद्धांत एवं उनकी उपादेयता प्रथम भाग, चैखम्भा कृश्णदास अकादमी, वाराणसी, तृतीय 2010

15.       K Sembulingam Prema Sembulingam, Essential of Medical Physiology, Jaypee Brothers Medical Publishers Ltd. New Delhi, Fourth Edition 2012.

 

 

 

 

Received on 21.12.2020         Modified on 24.12.2020

Accepted on 26.12.2020         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2020; 8(4):181-186.